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Chapter 2 जैसे उसने अकेले पैदा किया है....

Thakur Mansion

एक बड़ा सा mansion… ऊँचा लोहे का गेट… उसके आगे लंबा रास्ता, जो ek बड़े लकड़ी के गेट के आगे रुकता है l

गेट खुलते ही घंटियों की आवाज़ और अगरबत्ती–धूप की सुगंध से वातावरण पवित्र हो उठा। हवेली के मंदिर में आरती चल रही थी।

आरती कर रही थीं एकता ठाकुर ( आदित्य की मम्मी)— अब भी जवान और सौम्य चेहरा। उनके साथ बैठी थीं उम्रदराज़ गायत्री ठाकुर (दादीजी), जिनकी कड़क नज़र आज भी पूरे घर पर राज करती थी।

आरती समाप्त होते ही दादीजी का आदेश भरा स्वर गूंजा —

“एकता बहू, प्रसाद सबमें बाँट देना।”

एकता ने शांत भाव से सिर झुकाया —

“जी माँ जी।”

तभी अचानक mansion का माहौल बदल गया।

भारी कदमों और गुस्से भरी आवाज़ के साथ आकाश ठाकुर (आदित्य के पिता) हॉल में दाखिल हुए —

“आदित्य…! बाहर आओ… अभी के अभी!”

उनकी दहाड़ से mansion के नौकर–चाकर सहमकर इकट्ठा हो गए।

दादीजी ने भौंहें चढ़ाते हुए पूछा —

“क्या बात है, आकाश? सुबह-सुबह क्यों गरज रहे हो?”

आकाश ने गुस्से में दाँत भींचे —

“माँ, पहले उस साहबज़ादे को आने दीजिए, फिर बताता हूँ।”

एकता घबराई सी बोलीं —

“वो तो कल रात ही कहीं चला गया था… बोला था, काम से जा रहा हूँ।”

आकाश व्यंग्य से हंसे —

“काम? गया होगा और किसी को उड़ाने?”

दादीजी का स्वर और कड़क हो गया —

“सीधे बोल भी देगा या यूँ ही ढोल पीटता रहेगा?”

एकता जी ने भी चिंतित स्वर में पूछा -- क्या हुआ जी?

आकाश जी शांत मगर कठोर लहजे में उत्तर दिया -- कल शाम उसने भरे बाज़ार 2 लोगों को गोली मार दी l

दादीजी और एकता जी का मन ये सुनने के बाद शांत हुआ l

दादीजी बोली -- तो कुछ किया होगा उन्होंने , वरना आदित्य ऐसा नहीं करेगा l

आकाश जी:- मां आप हमेशा उसका साथ देते हो... वो जिद्दी आपके लाड प्यार की वजह से बना है l

दादीजी कड़क स्वर में बोली -- भूलो मत तुम.. वो बड़ाबिजनेसमैन है अब , खौफ होना चाहिए उसका लोगो में l

आकाश जी:- खौफ मां... सारे शहर के लोग सही से खड़े भी नहीं हो पाते उसके आगे l

आकाश जी ने माथा पकड़ते हुए कहा –

"पता नहीं किस पर गया है ये! मैं तो ऐसा कभी नहीं था।"

दादीजी ने मज़ाकिया अंदाज़ में तंज कसा,

"किस पर गया होगा? तेरे बाप पर! , उनसे भी दो कदम आगे निकला ।"

आकाश जी चिढ़ते हुए एकता जी की तरफ मुड़े,

"आपका बेटा मेरी एक नहीं सुनता!"

दादीजी तुरंत बीच में बोल पड़ीं –

"अरे वाह! जैसे उसने अकेले ही पैदा किया है इसे!"

एकता जी शर्म से चुप रहीं।

पर आकाश जी बड़बड़ाते हुए, दाँत भींचकर बोले –

"काश उस रात मैं सो गया होता… तो ये पैदा ही ना होता!"

ये सुनते ही एकता जी का चेहरा लाल हो गया।

लेकिन कुछ बोल नहीं पाईं।

दादीजी अचानक गंभीर होकर बोलीं,

"इनको सुधारने का एक ही रास्ता है।"

दोनों ने चौंककर उनकी तरफ देखा।

आकाश जी और एकता जी (एक साथ):

"क्या रास्ता है, माँ?"

दादीजी ने मुस्कुराकर कहा –

"शादी।"

एकता जी और आकाश जी चौकते हुए एक साथ बोले -- मां आपको तो पता है, वो शादी के नाम से ही चिढ़ता है l

दादीजी वहां से जाते हुए बोली -- वो मेरी बात नहीं टालेगा l

एकता जी और आकाश जी उनकी बात सुनते हुए उन्हें जाता देख रहे थे l

Continue....

His thakurain....

Comment for next chapter....☺️

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